राजेन्द्र अवस्थी किंकर

बीड़ी सिगरेट तंबाकू से

बीड़ी सिगरेट तंबाकू से,

बने कैंसर रोग ।

मै ये कहता नहीं दोस्तो ,

कहते सारे लोग ।

कर जीवन को नष्ट ,

धुंए को पेट में भरकर ।

हो जाते बीमार तभी ,

डाक्टर से कहे ये डरकर ।

मरना नहीं चाहता हूं मै ,

मुझको लेओ बचाएं ।

पैसे की चिंता मत करना ,

जितना भी लग जाए

जिसका नहीं है एंसर ।

तभी डाक्टर बोले भैया ,

ईश्वर को तुम याद करो ,

तुमको हो गया कैंसर ।

पहले जीवन नष्ट किया ,

अब कियों  रहे हो रोए

चिड़ियां दाना चुंग गई ,

सोचें से किया होय ।

पुड़िया पर तो था लिखा ,

पढ़ न सके श्री  मान ।

कह किंकर देते रहे ,

तुम औरो को ज्ञान ।

 

    कवि राजेन्द्र अवस्थी किंकर

नशा करेगा एक दिन

नशा करेगा एक दिन ,

तन का सत्यानाश ।

साथ नहीं देगा कोई ,

कर ले तू विश्वाश ।

कर ले तू विश्वाश ,

मुश्किल हो जाएगा जीना ।

दारू सिगरेट बीड़ी ,इसको कभी न पीना ।

पिया अगर तो वने ,केंसर टी वी प्यारे  ।

बीड़ी से हो श्वास रोग ,  कहते है सारे ।

कह किंकर फिर श्वास में ,जीना दूभर होय

असमय ही छुट जाए तन , बचा सके न कोय ।

 

      कवि राजेन्द्र अवस्थी किंकर

इक़बाल मेंहदी काज़मी

जिंदगी

दुनिया में कब किसी से संभलती है जिंदगी

मुट्ठी की रेत जैसी फ़िसलती है जिंदगी ।।

लगता है बढ़ रही है, है ऐसा नहीं मग़र

हर लम्हा ईक शमाँ सी पिघलती है जिंदगी।।

रोटी, मकान, कपड़ा और कुछ आन-बान हो

इस भाग-दौड़ में ही निकलती है जिंदगी।।

प्रस्तुति – संगीता शर्मा

कोरोना लॉक-डाउन​

जीतनी है जंग अगर ज़िन्दगी की
रुकिये घरो में ,
परिवार के साथ समय बिताइये
वक़्त कठिन है
खतरा है हर तरफ
देश ही नहीं,
विदेश भी है, व्याधि ग्रस्त
वक्त की नजाकत को समझ जाइये
जीतनी है जंग अगर जिन्दगी की
रुकिये घरों में,
परिवार के साथ समय बिताइये

मौत कर रही है
ताण्डव हर तरफ….

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