विचार क्या है ?

प्रश्न – विचार क्या है ? और कैसे उत्पन्न होता है ?

उत्तर – विचार हमारे शरीर की आन्तिरिक क्रिया द्वारा उत्पन्न एक भाव है
मनुष्य का मस्तिष्क मुख्य रूप से दो आधे गोलांे में बटा हुआ हैं। उल्टे हाथ के तरफ वाला आधा गोला (अर्ध मस्तिष्क) हर तरह की सूचनाओं व संदेशो को सुरक्षित रखने का काम करता है यानी याददाश्त बनाये रखने का काम करता हेै तथा सीधे हाथ वाले आधे सिर का मस्तिष्क का कार्य मनुष्य की कल्पनात्मक किृयाओं(कामों )को करने में मुख्य भूमिका निभाता है मुख्य रूप से हमारी दिनचर्या में ये ही हिस्सा कार्य करता है ।

उदाहरण के तौर पर यदि हम कोई लिखी लिखाई या बनी बनाई चीज जैसे अपने पाठ का कोई प्रश्न याद करते है या उसे बार बार रटते है तो बह कार्य मस्तिष्क के उल्टे हाथ वाले आधे गोले का कार्य कहलायेगा। और यदि हम कोई (रचनात्मक, या कलात्मक कार्य करते है )चित्र बनाते है या कोई ऐसी वस्तु का नया निर्माण करते है जो हमारे मन -मस्तिष्क के द्वारा पैटर्न तैयार किया गया हो यह कार्य दिमाग के सीधे हाथ वाले आधे गोले के द्वारा होता है।

इस तरह – सीधे हाथ वाले अर्ध गोले ( मस्तिष्क )द्वारा काल्पनिक रचनाओं का निर्माता माना जाता है इन दोनो अर्ध गोलो के बीच एक तरह का कन्जक्शन प्वाइन्ट लगा होता है जिनकी संख्या खरबों में आंकी गई है (लगभग 11 खरब )

इन दोनो अर्ध गोलों में इस कन्जक्शन प्वाइन्ट के द्वारा परस्पर अपने अपने कार्यों का आदान – प्रदान होता रहता है । जिसमें उल्टे हाथ वाले गोले की किृयाओं का बहुत ज्यादा महत्व होता है क्योंकि जब हम कोई शब्द उच्चारण करते है या उसकी स्म्रति स्थापित करने की कोशिश में लगे होते है उस समय हमारे मस्तिष्क के सीधे हाथ वाले अर्ध भाग में बहुत सारे नवविचार उत्पन्न होते है जिसमें कुछ विचार बचते है और बहुत सारे नवविचार निरन्तर नष्ट होते रहते है जो कि एक प्राकृतिक प्रक्रिया होती है।

तो इसे संक्षेप इस तरह भी कहा जा सकता है कि मनोवैज्ञानिक क्रियाओं और शारीरिक क्रियाओं का परिणाम हमारा भौतिक (बाहरी) व्यवहार है किन्तु इस व्यवहार की संरचना (डिजायन),नक्सा उस आन्तरिक शूक्ष्म तत्व के द्वारा नियन्त्रित या क्रियान्वित होता है जो मस्तिष्क और शारीरिक क्रिया तथा व्यवहार के बीच एक काल्पनिक पैटर्न(संरचना)प्रस्तुत करता रहता है इसी शूक्ष्म तत्व को हम लोग आत्मा तथा इससे र्सजित पैर्टन(संरचना)को विचार कह सकते है।

लेखक के दो शब्द

़यह एक तरह की रीसाइकिलिंग (क्रमव्रत्तीय)है जोकि सिर्फ प्रकृति द्वारा नियन्त्रित है इसी लिय शायद मैंने इन विचारों को उत्पादित करने वाले की कल्पना श्री दक्ष के रूप में की। क्योंकि दक्ष का मतलब हर तरह से निपुण व्यक्ति से है और ऐसी क्षमता इस रीसाइकिलिंग के अतिरिक्त कहीं और दिखाई नही दी । इसलिय प्रत्येक दक्ष श्रीदक्ष रूपी क्रमव्रत्तीय से प्रेणना द्वारा ही अपने आप को व्यवस्थित करते है और प्रकृति की नीतियों के अनुशार ही अपने जीवन के सभी क्रिया-कलापों कोे अनुशासित करने की कोशिश करते है । देखें विषय दक्ष पेज ।

नोट – इस विषय में यह जान लेना अति आवश्यक है कि यह नवविचार वर्तमान में क्रियान्वित किया जा सके या न किया जा सके इस बात से नवविचार पर कोई फर्क नही पडता है।

परिभाषा » व्यवहार शरीर की मनोंवैज्ञानिक और शारीरिक क्रियाओं का परिणाम है FST-1 ,BOOK NO.6, STARTING PAGES ignou)

वल्कि मैं इस परिभाषा को इस प्रकार कहना चाहुंगा कि व्यवहार शरीर की मनोंवैज्ञानिक और शारीरिक क्रियाओं का परिणाम है और विचार आप के व्यवहार की शूक्ष्म प्रथम कडी है । (जगमोहन दक्ष )।

दो शब्द लेखक द्वारा – जरूरी नही कि जो कल्पना या नवविचार या आन्त्रिक मंत्रणा की गई हो बह वर्तमान में करना सम्भव हो।मान्यवर पाठकगण मैं आप को इस लेख के माध्यम से यह विश्वास के साथ बताना चाहता हू कि अधिकतर नवविचार वर्तमान में सम्भव ही नही होते है लेकिन हमको इसकी अति आवश्यकता वर्तमान में ही होती है इसीलिय हमको अपना हर विचार सुरक्षित करने की कोशिश करनी चाहिए जो विचार आज सामाजिक या यांत्रिक या आर्थिक परिस्थितियों के कारण सम्भव नही है लेकिन इसकी आवश्यकता तो है ही। तो जिस चीज की आवश्यकता है तो उसे कम से कम हम सुरक्षित तो कर ही सकते है। उस आवश्यकता रूपी नवविचार का रूप ,महत्व , क्षमता , क्रिया विधि , आदि की रूपरेखा तैयार कर के यदि उस रचना को आप कहीं सुरक्षित कर दें तो निष्चय ही आप का बह विचार आप और इस समाज के लिय बहुत ही लाभदायक साबित होगा ।

प्रश्न- क्या कोई ऐसा व्यक्ति हुआ है जो इस तरह अपने विचार सुरक्षित करने के पश्चात उस विचार से कोई सफलता हासिल की हो ?

उत्तर – ऐप्पल मोबाईल ,निरमा , एडिसन भारतरत्न लक्ष्मण प्रशाद का जिक्र करने के बाद बाप को यह ज्ञात हो जायेगा कि ऐसे किसी भी व्यक्ति के सफलता की सुरूआत सर्वप्रथम किसी विचार से ही होती है।

आर टी चेन्ज विचार बैंक इस बात का एक और बेहतर उदाहरण है

जब मैं किशोरावस्था में था उन दिनों मेरे भी मस्तिष्क में तरह तरह के शवाल आया करते थे नये नये काल्पनिक विचारों मैं बिल्कुल खो जाया करता था उन सब विचारों को एकत्र करने की कोशिश करता था कुछ विचारों को मैं लिख लेता था और कुछ को नही लिख पाता था जिन विचारो को मैं नही लिख पाता था उनको दुबारा याद करने की बहुत कोशिश करता था परन्तु बह विचार फिर याद नही आते थे जिस कारण मैं बहुत परेशान हो जाया करता था तब मुझे एक ऐसे संग्रहालय की जरूरत महसूस हुई जो मेरे विचारों को जब मैं चाहूं तब संग्रहित कर सके ।

इस विचार को सर्वप्रथम मैंने अपनी आठवीं कक्षा की रफ कापी पर लिखा था जोकि आज आप के सामने आर टी चेन्ज विचारों का बैंक के रूप में उपलब्ध है मैंने इस बात की कल्पना उस समय ही कर ली थी कि ऐसे संग्रहालय में विचार रखे ही नही वल्कि दिये भी जा सकते है जो कि एक प्रकार से विचारों के लेन -देन का काम भी कर सकता है अगर मैंने उस विचार को सुरक्षित नही किया होता तो शायद आज भारत में पहला विचारों का बैंक खोलने का गौरव कम से कम मुझे तो प्राप्त नही हुआ होता।

अगर इस विचार से आज मैं गौरान्वित हो सकता हूं तो मुझे यह कहते विल्कुल सन्देह नही कि कल को हमारा ये पूरा देश इस विचार से गौरान्वित हो सकता है। प

और आज उस विचार को सुरक्षित करने की वजह सेे आप एक वैचारिक संग्रह का लाभ उठा पा रहे हैं जिसका नाम आर टी चेन्ज विचारों का बैंक है ।मैं तो आप से यही कहुगाँ कि आवश्यकता ही आविश्कार की जननी होती है और आविश्कार का उपभोग आविष्कार की उम्र निर्धारित करता है( परिभाषा जगमोहन दक्ष)। अतः आर टी चेन्ज रूपी इस आविष्कार को आप लोग जितना इस्तेमाल करेंगे उतनी ही इस बैंक की आयु ब

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